अंत

आदि हैँ तो अंत है |

सब पड़े हैँ अपनी ही मौज में कोई नहीं यहाँ संत हैँ |

नहीं समय किसी के पास भी सभी पड़े तुरंत हैँ |

सीमा नहीं कोई ब्रह्माण्ड की ये तो अनंत है |

जीव जंतु का करे शिकार शिकारी खुद शिकार के नियंत्र में है|

तुम जायोगे कहाँ बच के यहाँ तो हर तन्त्र है |

इंसान ने क़ैद किया इंसान को कौन बचा स्वतंत्र है |

दफन हो कर रहोगे एक दिन मिट्टी में
मौत को मार सके ऐसा ना कोई मंत्र है |

लिखा है जो हो कर रहेगा
बदल दे जो वक़्त को ऐसा कौन सा यँत्र है |

आदि है तो अंत है

आदि है तो अंत है ||

तबायफ

मयखानो में ही मिलती है एक तबायफ को इज़्ज़त

जहाँ दिमाग़ का गुरुर बेबस होता है वरना कौन तबायफ को इज़्ज़त देता है

इज़्ज़तदार ही तो शायद मयखानो में मिलते हैँ