आदि हैँ तो अंत है |
सब पड़े हैँ अपनी ही मौज में कोई नहीं यहाँ संत हैँ |
नहीं समय किसी के पास भी सभी पड़े तुरंत हैँ |
सीमा नहीं कोई ब्रह्माण्ड की ये तो अनंत है |
जीव जंतु का करे शिकार शिकारी खुद शिकार के नियंत्र में है|
तुम जायोगे कहाँ बच के यहाँ तो हर तन्त्र है |
इंसान ने क़ैद किया इंसान को कौन बचा स्वतंत्र है |
दफन हो कर रहोगे एक दिन मिट्टी में
मौत को मार सके ऐसा ना कोई मंत्र है |
लिखा है जो हो कर रहेगा
बदल दे जो वक़्त को ऐसा कौन सा यँत्र है |
आदि है तो अंत है
आदि है तो अंत है ||
